एईआरबी का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत में आयनीकारक विकिरण तथा नाभिकीय ऊर्जा के कारण लोगों के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को किसी भी प्रकार का अवांछित जोखिम न हो ।

पार्श्वपृष्ठीय प्राकृतिक विकिरण

पार्श्वपृष्ठीय विकिरण अर्थात पर्यावरण में उपस्थित आयनीकारक विकिरण जो कि प्राकृतिक स्रोत अथवा कृत्रिम / मानव निर्मित स्रोत से प्राप्त हो सकता है। प्राकृतिक पार्श्वपृष्ठीय विकिरण के स्रोत हैं; अंतरिक्ष किरणें तथा भौमिक स्रोत, जमीन, इमारतों की दीवारों व फर्श से उत्सर्जित होने वाले रेडियो सक्रिय पदार्थ जैसे कि रेडॉन, तथा भोज्य एवं पेय पदार्थों में प्राकृतिक रूप से उपस्थित रेडियोसक्रिय पदार्थ । कृत्रिम या मानव निर्मित विकिरण स्रोतों में शामिल हैं नाभिकीय हथियारों के परीक्षण से निकलने वाला विकिरण तथा बड़ी नाभिकीय दुर्घटनाएँ, आयनीकारक विकिरण के चिकित्सा नैदानिक व थेरेपेटिक प्रयोग, एक्स-रे मशीनें, कण त्वरक, उपभोक्ता उत्पाद एवं रेडियोसक्रिय पदार्थों का परिवहन।

पार्श्वपृष्ठीय प्राकृतिक विकिरण की विश्व स्तर पर औसत प्रभावी डोज लगभग 2.4 mSv/वर्ष (2400 Sv/वर्ष) है। केरल में समुद्र तटों पर यह 12.5 mSv/वर्ष है। उत्तरी ईरान में यह मात्रा लगभग 260 mSv/वर्ष है।


1 Gy = 1 J/ kg पदार्थ अथवा ऊतक का निक्षेपण

1 Sv = 1J/kg मानवीय ऊतकों के निपेक्षण का जैविकीय प्रभाव, अर्थात प्रभावी डोज ।

भारत में पार्श्वपृष्ठीय प्राकृतिक विकिरण नीचे चित्र 1 में दर्शाया गया है :

चित्र 1: भारत में प्राकृतिक पार्श्वपृष्ठीय विकिरण



साभार=परमाणु ऊर्जा के बारे में आम लोगों की धारणाएँ, मिथक बनाम वास्तविकताएँ

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