एईआरबी का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत में आयनीकारक विकिरण तथा नाभिकीय ऊर्जा के कारण लोगों के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को किसी भी प्रकार का अवांछित जोखिम न हो ।

रेडियोसक्रिय अपशिष्‍ट प्रबंधनt

नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों तथा अन्‍य ईंधन चक्र सुविधाओं में उत्‍पन्‍न रेडियोसक्रिय तथा रासायनिक, दोनों प्रकार के अपशिष्‍टों के प्रबंधन की गतिविधियां नियामक संस्‍था के अंतर्गत आती है। परमाणु ऊर्जा विभाग की औद्योगिक व अनुसंधान सुविधाओं में अपशिष्‍ट प्रबंधन भी एईआरबी के अंतर्गत है। निदान व चिकित्‍सा में रेडियोसक्रिय स्रोतों का प्रयोग करने वाली सुविधाओं को भी एईआरबी द्वारा निर्देशित आवश्‍यकताओं का पालन करना अनिवार्य है।

स्रोत के अनुसार रेडियोसक्रिय अपशिष्‍ट प्रबंधन/निपटान की वर्गीकृत जानकारी

नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों से अपशिष्‍ट

अपशिष्‍ट प्रबंधन की समीक्षा संयंत्र के पूरे जीवनकाल (स्‍थल चयन, निर्माण, कमीशनन, प्रचालन एवं विकमीशनन) के दौरान की जाती है।

प्रचालित नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों में ठोस, तरल व गैसीय अपशिष्‍ट उत्‍पन्‍न होते हैं। अपशिष्‍ट प्रबंधन की नीति यह है कि किसी भी रूप में अपशिष्‍ट पर्यावरण में विमोचित नहीं किया जाता जब तक उसे नियमन से विमुक्ति, छूट या अपवर्जन न प्राप्‍त हो। रेडियोसक्रिय अपशिष्‍ट प्रबंधन संयंत्रों में प्रयुक्‍त प्रक्रियाओं व तकनीकों के चुनाव में अपशिष्‍ट तथा उसके आयतन को न्‍यूनतम रखने को प्राथमिकता दी जाती है। रेडियोसक्रिय अपशिष्‍ट प्रबंधन के लिये निम्‍न रणनीति अपनायी जाती है।

  • देरी करना ताकि अल्‍पस्‍थायी रेडियोनाभिकों का क्षय हो जाये;
  • सक्रियता को सांद्रित करना तथा व्‍यवहारिक स्‍तर तक सीमित रखना; तथा
  • निम्‍न सक्रियता के अपशिष्‍ट को अनुमतस्‍तर तक तनु करके विक्षेपित करना।

नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों से उत्‍पन्‍न सक्रियता के ठोस, तरल व गैसीय अपशिष्‍ट को नियामक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करते हुए अनुमोदित विधि के अनुसार निपटाया जाता है। वर्तमान नियमों के अनुसार, नाभिकीय संयंत्रों के निकट रहने वाले व्‍यक्तियों को संयंत्र से विसर्जन के कारण एक वर्ष में 1 mSv (1000 माइक्रोसीवर्ट) से अधिक डोज़ नहीं मिलनी चाहिये। यह सीमा अंतर्राष्‍ट्रीय विकिरण संरक्षण कमीशन (ICRP) द्वारा निर्दिष्‍ट सीमा के अनुरूप है। एईआरबी निपटाये जाने वाले अप‍शिष्‍ट की मात्रा एवं सक्रियता की सीमायें निर्दिष्‍ट करके प्राधिकार जारी करता है। ये प्राधिकार तीन वर्ष के लिये वैध होते हैं तथा संयंत्र के कार्य निष्‍पादन की समीक्षा के बाद इनका नवीनीकरण किया जाता है। तरल व गैसीय मार्गों से विसर्जन के लिये भी संयंत्र के प्रचालन के तकनीकी विनि‍र्देशों में सीमायें निर्धारित की जाती है। ये तकनीकी विनिर्देश सीमायें जनता को प्रत्‍येक रेडियोनाभिक के लिये आबंटित डोज़ से काफी कम होती है।

नाभिकीय अपशिष्‍ट के प्रबंधन में निम्‍न तकनीकें अपनायी जाती हैं :

  • ठोस अपशिष्‍ट : संयंत्र के उत्‍पन्‍न ठोस अपशिष्‍ट को उपयुक्‍त अनुकूलन के बाद अपवर्जन क्षेत्र सीमा के अंदर स्थित सतह समीपी निपटान सुविधाओं में निपटाया जाता है। ये निपटान सुविधायें इस प्रकार डिज़ाइन व निर्मित की जाती हैं कि रेडियोनाभिकों के नगण्‍य सक्रियता स्‍तर तक क्षय होने तक वे निपटान स्‍थल में ही बने रहे।
  • तरल अपशिष्‍ट : संयंत्र से उत्‍पन्‍न कम सक्रियता वाले तरल अपशिष्‍ट को नियामक सीमा का पालन करते हुए उपचार के बाद पर्यावरण में विसर्जित कर दिया जाता है। उपचार तंत्र में रासायनिक उपचार, वाष्‍पीकरण, आयन विनिमय, फिल्‍टरन आदि शामिल हैं।
  • गैसीय अपशिष्‍ट : गैसीय अपशिष्‍ट का स्रोत पर ही उपचार किया जाता है। फिल्‍टरन, तनुकरण, रेडियोनाभिकों के निरंतर मानीटरन तथा नियामक सीमाओं के अनुपालन के बाद इसे 100 मीटर ऊंची चिमनी द्वारा पर्यावरण में विसर्जित कर दिया जाता है।

नाभिकीय संयंत्रों द्वारा ‘निपटारित अपशिष्‍ट का लेखा’ एईआरबी को भेजना अपेक्षित है। नियामक निरीक्षणों के दौरान एईआरबी इस बात की समीक्षा करता है कि निपटारित अपशिष्‍ट तकनीकी विनिर्देशों में निर्दिष्‍ट सीमाओं के अंदर हैं। साथ ही स्‍थलों पर भा.प.अ.केंद्र द्वारा स्‍थापित की गयी पर्यावरण सर्वेक्षण प्रयोगशालायें ऐसे विसर्जनों के पर्यावरण पर प्रभाव का स्‍वतंत्र सर्वेक्षण करती हैं।

नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों के अलावा अन्‍य ईंधन चक्र सुविधाओं से उत्‍पन्‍न अपशिष्‍ट
चिकित्‍सा, उद्योगों तथा अनुसंधान सुविधाओं में उत्‍पन्‍न अपशिष्‍ट

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